जगदलपुर। बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, लोक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का प्रतीक विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा मंगलवार को मावली माता की डोली की विदाई के साथ संपन्न हो गया। करीब 75 दिनों तक चले इस ऐतिहासिक पर्व के अंतिम आयोजन में माता के दर्शन और विदाई के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे। दंतेश्वरी मंदिर से जिया डेरा तक भक्तों ने पूजा-अर्चना कर माता से सुख-समृद्धि की कामना की और भावुक मन से उन्हें विदाई दी।

जिया डेरा मंदिर में परंपरागत विधि से हुई पूजा
जगदलपुर के गीदम रोड स्थित जिया डेरा मंदिर में मावली माता की डोली की विदाई से पहले विशेष पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव, जिन्हें माटी पुजारी के रूप में जाना जाता है, ने श्रद्धालुओं के साथ धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया।
Join Our Whatsapp Group

पूजा के बाद निर्धारित रीति-रिवाजों के अनुसार डोली को विदा किया गया। इस अवसर पर बस्तर पुलिस के जवानों ने बंदूकों से सलामी देकर गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया। सुरक्षा और सम्मान के बीच पूरी हुई विदाई की रस्म ने आयोजन को विशेष बना दिया।

दो किलोमीटर के रास्ते में जगह-जगह हुआ स्वागत
मावली माता की डोली की विदाई के दौरान दंतेश्वरी मंदिर से जिया डेरा तक करीब दो किलोमीटर लंबे मार्ग पर श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आई। लोग फूल-मालाएं, नारियल और अगरबत्ती लेकर माता के स्वागत और दर्शन के लिए खड़े रहे।

मार्ग में कई स्थानों पर भक्तों ने डोली की पूजा की और आशीर्वाद मांगा। माता की विदाई के इस दृश्य में धार्मिक उत्साह के साथ भावुकता भी देखने को मिली। बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के साथ अन्य श्रद्धालु भी इस पारंपरिक आयोजन के साक्षी बने।

नवरात्रि में दंतेवाड़ा से जगदलपुर आती है डोली
बस्तर दशहरा की विशिष्ट परंपरा के अनुसार, राजपरिवार के निमंत्रण पर दंतेवाड़ा से मावली माता की डोली जगदलपुर लाई जाती है। नवरात्रि की नवमी पर मावली परघाव की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद दशहरा उत्सव के दौरान आयोजित विभिन्न धार्मिक और पारंपरिक कार्यक्रमों में डोली की सहभागिता होती है।

विजयादशमी के बाद निर्धारित मंगलवार को माता की डोली की विदाई की जाती है। इससे पहले बस्तर संभाग के विभिन्न क्षेत्रों से पर्व में शामिल होने पहुंचे देवी-देवताओं को भी परंपरा के अनुसार विदा किया जाता है। मावली माता की डोली के प्रस्थान के साथ ही इस वर्ष के प्रमुख धार्मिक आयोजन पूरे हो गए।

छह सदियों से जीवंत है बस्तर दशहरा की परंपरा
बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट पहचान और लंबी अवधि के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। इसकी परंपरा लगभग 600 वर्षों से चली आ रही है। इस पर्व में एक दर्जन से अधिक विशेष रस्में निभाई जाती हैं, जिनमें आदिवासी समाज की मान्यताओं, देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा और बस्तर की राजपरंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

हर वर्ष इस उत्सव में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में लोग जगदलपुर पहुंचते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले पर्यटकों के साथ विदेशी सैलानी भी बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक आयोजनों को करीब से देखने में रुचि लेते हैं।

डोली विदाई के साथ अगले वर्ष का इंतजार
मावली माता की डोली को मंगलवार को सम्मानपूर्वक दंतेवाड़ा के लिए रवाना किया गया। विदाई के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और बस्तर के सांसद महेश कश्यप भी मौजूद रहे।

करीब ढाई महीने तक चले इस उत्सव का समापन बस्तरवासियों के लिए भावनात्मक क्षण रहा। मावली माता की डोली की विदाई के साथ ही शहर में धार्मिक आयोजनों का सिलसिला अगले वर्ष तक के लिए थम गया। बस्तर दशहरा एक बार फिर अपनी अनूठी परंपराओं, सामूहिक सहभागिता और लोक आस्था के जरिए क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को सामने लाकर संपन्न हुआ।
Published By- | 27-Oct-2026 05:16:00 pm