कार्यक्रम के दौरान बस्तर की परंपराओं को संरक्षित रखने वाले पारंपरिक प्रतिनिधियों के मानदेय में वृद्धि की जानकारी भी दी गई। अब मांझियों को 5,000 रुपये और चालकी को 3,500 रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलेगा।
75 दिनों तक चलने वाला अनूठा उत्सव है बस्तर दशहरा
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के कारण देश-दुनिया में अलग पहचान रखता है।
लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव विभिन्न समुदायों को एक सूत्र में जोड़ता है और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखता है।
उन्होंने कहा कि इस आयोजन में अलग-अलग गोत्रों और समुदायों के लोग अपनी पारंपरिक जिम्मेदारियां निभाते हैं। रथ निर्माण, रथ खींचने, पूजा-अर्चना और विभिन्न अनुष्ठानों में समाज के अनेक वर्गों की भागीदारी देखने को मिलती है। यह परंपरा आपसी सहयोग, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
मुरिया दरबार को बताया लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक
राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा के दौरान आयोजित होने वाले मुरिया दरबार की विशेषता का उल्लेख करते हुए इसे जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक संवाद का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इस परंपरा में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर जनसमस्याओं और सामाजिक विषयों पर विचार-विमर्श करते हैं।
राष्ट्रपति के अनुसार, सामूहिक चर्चा के माध्यम से समाधान निकालने की यह परंपरा भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करती है। उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी और विचारों को सम्मान देना लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषता है।
जनजातीय युवाओं की प्रतिभा को आगे बढ़ाने पर जोर
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि जनजातीय समाज में प्रतिभा और संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि युवाओं को उचित अवसर, संसाधन और प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे शिक्षा, खेल और अन्य क्षेत्रों में अपनी पहचान बना सकें।
उन्होंने बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने के साथ उनकी प्रतिभा को सामने लाने में भी मदद करते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि बस्तर के युवा भविष्य में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपलब्धियों से देश का गौरव बढ़ाएंगे।
प्रकृति संरक्षण को बताया जनजातीय जीवन का अहम हिस्सा
राष्ट्रपति ने बस्तर की जनजातीय परंपराओं में प्रकृति के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पेड़-पौधों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान जनजातीय जीवन दर्शन का अभिन्न हिस्सा है।
उन्होंने लोगों से वनों के संरक्षण और अधिक से अधिक पौधे लगाने का आह्वान किया। राष्ट्रपति ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पर्यावरण और जैव विविधता सुरक्षित रह सके।
उन्होंने बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए दंडकारण्य, भगवान श्रीराम के वनवास और माता शबरी से जुड़ी परंपराओं को भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बोले- विकास की नई राह पर बस्तर
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए कहा कि उनकी उपस्थिति से बस्तरवासियों का उत्साह बढ़ा है। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सामूहिक आस्था, सामाजिक एकता और समृद्ध जनजातीय संस्कृति का प्रतीक है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर अब हिंसक माओवाद से मुक्त होकर विकास और नवनिर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। राज्य सरकार का लक्ष्य दूरस्थ गांवों तक सड़क, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना है।
उन्होंने नियद नेल्लानार योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और पीएम-जनमन योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि इन पहलों के माध्यम से अंदरूनी क्षेत्रों में विकास कार्यों को गति दी जा रही है। मुख्यमंत्री ने बताया कि बस्तर में रेल संपर्क, सड़क नेटवर्क, स्वास्थ्य सुविधाओं और पर्यटन के विस्तार के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।
मांझियों और चालकी के मानदेय में बढ़ोतरी
कार्यक्रम में संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने बताया कि बस्तर की परंपराओं को संरक्षित रखने वाले पारंपरिक प्रतिनिधियों के मानदेय में वृद्धि की गई है।
मांझी: मासिक मानदेय 2,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये।
चालकी: मासिक मानदेय 1,500 रुपये से बढ़ाकर 3,500 रुपये।
इस निर्णय को पारंपरिक व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों के योगदान को सम्मान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया। बस्तर दशहरा की रस्मों और सामुदायिक परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में मांझियों, चालकी और अन्य पारंपरिक पदाधिकारियों की अहम भूमिका रहती है।
राज्यपाल ने भी की बस्तर की परंपराओं की सराहना
राज्यपाल रमेन डेका ने बस्तर दशहरा और विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक मूल्य भारतीय सभ्यता और संस्कारों में गहराई से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि बस्तर की सामूहिक परंपराएं समाज को मिल-जुलकर निर्णय लेने और हर व्यक्ति की बात सुनने की सीख देती हैं।
उन्होंने रथ निर्माण से लेकर उसके संचालन तक विभिन्न गांवों और समुदायों की भागीदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि बस्तर दशहरा सामाजिक संवाद और सहयोग की परंपरा को मजबूत करता है।
विकास और सांस्कृतिक विरासत को साथ लेकर आगे बढ़ने का संदेश
बस्तर दशहरा उत्सव में राष्ट्रपति की उपस्थिति के दौरान जनजातीय संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण, लोकतांत्रिक परंपराओं और क्षेत्र के विकास जैसे विषय प्रमुख रहे। राष्ट्रपति ने बस्तरवासियों के उज्ज्वल भविष्य और छत्तीसगढ़ की प्रगति की कामना की।
कार्यक्रम में उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, वन मंत्री केदार कश्यप, कृषि मंत्री राम विचार नेताम, शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े, बस्तर सांसद महेश कश्यप सहित अनेक जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और पारंपरिक समुदायों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
बस्तर दशहरा के इस आयोजन ने क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को सामने रखने के साथ पारंपरिक संस्थाओं के सम्मान और विकास की संभावनाओं पर भी जोर दिया।