ड्यूटी के दौरान कैमरे हमेशा चालू रखने की मांग
याचिका में मांग की गई है कि भीड़ नियंत्रण और प्रदर्शन से जुड़ी ड्यूटी पर तैनात पुलिस और RAF कर्मियों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरा पहनना अनिवार्य किया जाए और ऑपरेशन के दौरान कैमरे लगातार चालू रहें।
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याचिकाकर्ता ने कैमरों से रिकॉर्ड होने वाले फुटेज के स्टोरेज, रिटेंशन, डेटा की सुरक्षा और सबूत के तौर पर इस्तेमाल के लिए भी स्पष्ट नियम बनाने की मांग की है।
जंतर-मंतर के प्रदर्शन के बाद दाखिल हुई PIL
यह याचिका जुलाई 2026 में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में दाखिल की गई है। याचिका में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक से जुड़े प्रदर्शनों का भी उल्लेख किया गया है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं से जुड़े कई वीडियो आधिकारिक रिकॉर्डिंग सिस्टम के बजाय मौके पर मौजूद लोगों के मोबाइल फोन से सामने आए। उनके मुताबिक, ऐसी स्थिति में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई घटनाओं का प्रमाणित रिकॉर्ड तैयार करना मुश्किल हो सकता है।
फुटेज की सुरक्षा के लिए भी नियम बनाने की मांग
PIL में रिकॉर्ड किए गए वीडियो की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए तकनीकी और कानूनी सुरक्षा उपाय तय करने की मांग की गई है। इसमें हैश वैल्यू, सुरक्षित सर्वर पर फुटेज अपलोड, ऑडिट योग्य चेन ऑफ कस्टडी और फुटेज से छेड़छाड़ रोकने जैसे प्रावधान शामिल करने की मांग की गई है।
याचिका में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लागू भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam) के तहत आवश्यक प्रमाणन की व्यवस्था किए जाने की भी मांग की गई है।
2020 की एडवाइजरी पर भी उठाए सवाल
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि वर्ष 2020 की बॉडी-वॉर्न कैमरा संबंधी एडवाइजरी अनिवार्य व्यवस्था के बजाय सलाह तक सीमित थी। याचिका के मुताबिक इसमें कैमरों को हमेशा सक्रिय रखने, न्यूनतम फुटेज रिटेंशन अवधि, चेन ऑफ कस्टडी और कैमरा इस्तेमाल नहीं करने की स्थिति में जवाबदेही जैसे पहलुओं पर पर्याप्त स्पष्टता नहीं थी।
पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों की जवाबदेही का तर्क
याचिका में कहा गया है कि बॉडी-वॉर्न कैमरे पुलिस और नागरिकों के बीच होने वाली बातचीत और कार्रवाई का आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध करा सकते हैं। इससे जहां पुलिसकर्मियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच में मदद मिल सकती है, वहीं पथराव, तोड़फोड़ या पुलिसकर्मियों पर हमले के आरोपों की जांच के लिए भी प्रमाणित फुटेज उपलब्ध हो सकती है।
याचिकाकर्ता ने इसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर रोक लगाने के बजाय पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाला तंत्र बताया है।
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन ड्यूटी पर लगाए बॉडी कैमरे
इस बीच, हालिया विरोध प्रदर्शनों के बीच दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली क्षेत्र में प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण की ड्यूटी में तैनात कुछ फ्रंटलाइन कर्मियों को बॉडी-वॉर्न कैमरे उपलब्ध कराए हैं। यह कदम पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।
अब दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल PIL में इसी व्यवस्था को स्पष्ट नियमों और बाध्यकारी SOP के तहत लागू करने की मांग की गई है। मामले की सुनवाई में अदालत का रुख इस बात पर अहम होगा कि पुलिस और RAF के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल, रिकॉर्डिंग और फुटेज के संरक्षण को लेकर किस तरह की व्यवस्था तय की जाती है।