रायपुर। छत्तीसगढ़ के कोडार बांध में मछलियों की विविधता को लेकर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के शोध में अहम जानकारी सामने आई है। अध्ययन के दौरान जलाशय में मछलियों की 52 प्रजातियां दर्ज की गईं, जिनमें चार विदेशी प्रजातियां भी शामिल हैं। रायपुर से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित इस जलाशय में मछली पकड़ना आसपास के गांवों के कई परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन है। अध्ययन के मुताबिक, शोध में शामिल परिवारों की आय में मत्स्याखेट का योगदान लगभग 40 प्रतिशत पाया गया।

ICAR की रिसर्च में सामने आई मछलियों की विविधता
कोडार जलाशय पर किया गया यह अध्ययन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की पत्रिका इंडियन जर्नल ऑफ फिशरीज के सितंबर अंक में प्रकाशित हुआ है। इसमें जलाशय की मछली विविधता के साथ पानी की भौतिक और रासायनिक स्थितियों, मत्स्य उत्पादन, प्रबंधन व्यवस्था तथा स्थानीय लोगों की आजीविका में मछली पकड़ने की भूमिका का आकलन किया गया है।
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शोध के दौरान मछलियों की 52 प्रजातियां दर्ज की गईं। वहीं, पहले प्रकाशित सूचियों को मिलाकर जलाशय में दर्ज प्रजातियों की संचयी संख्या 60 तक पहुंचती है। अध्ययन में 11 ऐसी प्रजातियों का भी उल्लेख किया गया है, जो पहले की सूचियों में दर्ज नहीं थीं।
चार विदेशी प्रजातियां भी मिलीं

अध्ययन में कोडार बांध में चार विदेशी मछली प्रजातियों की मौजूदगी भी सामने आई है। जलाशय में देशी मछलियों के साथ विदेशी प्रजातियों का पाया जाना मत्स्य प्रबंधन और पारिस्थितिक निगरानी के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

विदेशी प्रजातियां जलाशय के पारिस्थितिकी तंत्र पर किस तरह का प्रभाव डालती हैं, इसे समझने के लिए नियमित निगरानी जरूरी है। शोध में भी विदेशी मछली प्रजातियों पर नजर रखने और जलाशय की पारिस्थितिक स्थिति का लगातार आकलन करने की जरूरत बताई गई है।
आसपास के गांवों के परिवारों की आजीविका का सहारा

कोडार बांध आसपास के ग्रामीण परिवारों के लिए केवल जल संसाधन नहीं, बल्कि रोजगार और आय का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। यहां मछली पकड़कर कई परिवार अपना जीवनयापन करते हैं।

शोध के मुताबिक, अध्ययन में शामिल परिवारों की कुल आय में मत्स्याखेट का योगदान लगभग 40 प्रतिशत पाया गया। हालांकि, यह आंकड़ा शोध में शामिल परिवारों के संदर्भ में है। इसे जलाशय के आसपास रहने वाले प्रत्येक परिवार की आय का प्रतिनिधि आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।
अध्ययन ग्रामीण आजीविका और जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के बीच गहरे संबंध को भी रेखांकित करता है।
सहकारी समिति के जरिए होता है मत्स्य प्रबंधन

शोध के अनुसार, कोडार जलाशय में मत्स्याखेट का संचालन सहकारी समिति आधारित प्रबंधन व्यवस्था के तहत किया जाता है। इसके अंतर्गत मछलियों का संचयन, जाल की जाली के आकार का नियमन और मौसम के अनुसार मछली पकड़ने पर प्रतिबंध जैसे उपाय शामिल हैं।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य मत्स्य संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और मछलियों की उपलब्धता को बनाए रखना है। अध्ययन में भारतीय प्रमुख कार्प प्रजातियों के बीज संचयन की आवश्यकता का मॉडल आधारित अनुमान भी प्रस्तुत किया गया है।
मछलियों के प्रजनन स्थलों की सुरक्षा पर जोर

शोध में जलाशय के संभावित प्रजनन स्थलों की सुरक्षा, विदेशी प्रजातियों की निगरानी और नियमित पारिस्थितिक सर्वेक्षण की आवश्यकता बताई गई है। इसके साथ मत्स्य संसाधनों की स्थिति समझने के लिए समय-समय पर सर्वेक्षण करने पर भी जोर दिया गया है।

विशेषज्ञों के लिए ऐसे अध्ययन यह समझने में मददगार होते हैं कि जलाशय में कौन-कौन सी प्रजातियां मौजूद हैं और मत्स्य उत्पादन को टिकाऊ बनाए रखने के लिए किन प्रबंधन उपायों की जरूरत है।

जल संसाधन और जैव विविधता के लिए अहम अध्ययन
कोडार बांध पर किया गया ICAR का यह अध्ययन छत्तीसगढ़ में जलाशय आधारित मत्स्य पालन की संभावनाओं और चुनौतियों को समझने में महत्वपूर्ण है। मछलियों की 52 प्रजातियों की मौजूदगी, चार विदेशी प्रजातियों का रिकॉर्ड और स्थानीय आजीविका में मत्स्याखेट की भूमिका इस जलाशय के आर्थिक और पारिस्थितिक महत्व को सामने लाती है।

अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर नियमित सर्वेक्षण, प्रजनन स्थलों की सुरक्षा और वैज्ञानिक मत्स्य प्रबंधन से जलाशय के संसाधनों को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
Published By- | 19-Oct-2026 12:00:00 pm