रायपुर। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं और जनजातीय आस्था के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह महोत्सव देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से अलग है। यहां रावण दहन नहीं होता, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना, पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और सामुदायिक सहभागिता के जरिए उत्सव मनाया जाता है।

सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत उदाहरण
बस्तर दशहरा का संबंध ऐतिहासिक राजपरिवार और मां दंतेश्वरी की आराधना से जुड़ा है। इस महोत्सव में जनजातीय समुदायों, ग्रामीणों, पारंपरिक पदाधिकारियों और स्थानीय देवी-देवताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। पीढ़ियों से चली आ रही ये परंपराएं बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता को दर्शाती हैं।
Join Our Whatsapp Group

इस महापर्व की शुरुआत हरेली अमावस्या पर होने वाली पाट जात्रा से होती है। इसके बाद काछिनगादी, जोगी बिठाई, रथ परिक्रमा, मावली परघाव और निशा जात्रा जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान संपन्न होते हैं। इन रस्मों में धार्मिक आस्था के साथ सामूहिक भागीदारी की विशेष झलक दिखाई देती है।
मुरिया दरबार है प्रमुख आकर्षण

बस्तर दशहरे के प्रमुख आयोजनों में मुरिया दरबार का विशेष स्थान है। यह परंपरा जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों और पारंपरिक पदाधिकारियों को एक मंच पर लाती है। यहां सामाजिक मुद्दों, जनसमस्याओं और सामुदायिक अपेक्षाओं पर चर्चा की जाती है।

इस आयोजन की तैयारियों को लेकर प्रशासन भी सक्रिय है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता को देखते हुए संबंधित स्थलों पर सुरक्षा, यातायात, मंच और जनसुविधाओं की व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई है।

पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। महोत्सव के दौरान हस्तशिल्प, पारंपरिक खानपान, परिवहन और पर्यटन से जुड़े लोगों को अवसर मिलते हैं। बस्तर के डोकरा शिल्प, टेराकोटा और काष्ठ कला जैसी पारंपरिक कलाओं को भी पहचान मिलती है।

छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और पर्यटन को प्रोत्साहित करने के प्रयासों से स्थानीय कलाकारों और कारीगरों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

संस्कृति, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार बस्तर की जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक विरासत को प्रोत्साहित करने पर जोर दे रही है। बस्तर दशहरा इस बात का उदाहरण है कि किस तरह सदियों पुरानी परंपराएं आज भी समाज को एक सूत्र में बांधे हुए हैं।

करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह महोत्सव छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक समृद्धि, जनजातीय अस्मिता और सामूहिक आस्था का प्रतीक है। इसकी विशिष्ट परंपराएं बस्तर को देश के प्रमुख सांस्कृतिक पर्यटन स्थलों में अलग पहचान दिलाती हैं।
Published By- | 19-Oct-2026 01:11:00 pm