रायपुर। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल रमा एकादशी का व्रत आज 5 नवंबर 2026, गुरुवार को रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में इस एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजन करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

रमा एकादशी को दीपावली से पहले आने वाली महत्वपूर्ण एकादशियों में गिना जाता है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, विष्णु सहस्रनाम और मंत्रों का जाप करते हैं तथा शाम को तुलसी के पास दीपक जलाते हैं। आइए जानते हैं रमा एकादशी की सही तिथि, पूजा का शुभ समय, व्रत के नियम, पारण और पौराणिक कथा।

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रमा एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, इस वर्ष एकादशी तिथि 4 नवंबर को सुबह 11:03 बजे शुरू हुई और 5 नवंबर को सुबह लगभग 10:36 बजे समाप्त हो रही है। उदया तिथि के आधार पर व्रत आज 5 नवंबर को रखा जा रहा है।

रायपुर के अनुसार प्रमुख समय:

व्रत की तारीख: 5 नवंबर 2026, गुरुवार
एकादशी तिथि समाप्त: 5 नवंबर, सुबह 10:36 बजे के आसपास
सूर्योदय: सुबह 6:08 बजे
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:24 बजे से दोपहर 12:10 बजे तक
राहुकाल: दोपहर 1:12 बजे से 2:36 बजे तक
व्रत पारण: 6 नवंबर, शुक्रवार

ध्यान दें कि पूजा पूरे दिन श्रद्धानुसार की जा सकती है। शुभ मुहूर्त और पारण का समय शहर के अनुसार अलग हो सकता है।

रमा एकादशी का पारण कब होगा?

रमा एकादशी का व्रत अगले दिन यानी 6 नवंबर, शुक्रवार को द्वादशी तिथि में खोला जाएगा।

रायपुर के स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण का समय सुबह 6:09 बजे से 8:24 बजे तक है। वहीं कुछ पंचांगों में पारण की अवधि सुबह 6:08 से 9:38 बजे तक दी गई है। इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पारण करना चाहिए।

पारण से पहले भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके बाद जल, फल या सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत खोलें। सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन और दान देना भी शुभ माना जाता है।

भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा कैसे करें?

रमा एकादशी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने की परंपरा है।

पूजा की सरल विधि:

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
घर के मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
घी का दीपक जलाकर धूप और अगरबत्ती अर्पित करें।
भगवान विष्णु को पीले फूल, पीला चंदन और तुलसी दल चढ़ाएं।
माता लक्ष्मी को कमल या अन्य सुगंधित पुष्प अर्पित करें।
फल, मिठाई और पंचामृत का भोग लगाएं।
'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें।
रमा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
अंत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करके प्रसाद वितरित करें।
रमा एकादशी पर चावल खाना क्यों माना जाता है वर्जित?

एकादशी के दिन चावल और अनाज का सेवन नहीं करने की धार्मिक परंपरा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन चावल खाने से व्रत का पुण्य प्रभावित होता है।

इससे जुड़ी एक प्रचलित कथा महर्षि मेधा से संबंधित है। मान्यता है कि महर्षि मेधा ने माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए अपना शरीर त्याग दिया था। उनके शरीर का अंश धरती में समा गया और बाद में उसी स्थान पर चावल और जौ उत्पन्न हुए।

कहा जाता है कि यह घटना एकादशी के दिन हुई थी। इसी वजह से चावल में महर्षि मेधा का अंश माना जाता है और एकादशी पर इसका सेवन वर्जित बताया गया है।

व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार फल, दूध, मखाना, साबूदाना, कुट्टू और सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन ग्रहण कर सकते हैं।

तुलसी पूजन और दीपदान का है विशेष महत्व

रमा एकादशी पर तुलसी पूजन और दीपदान को विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं। इसलिए इस दिन भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अर्पित करने की परंपरा है।

शाम के समय तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाया जाता है। इसके अलावा घर के मंदिर और देवस्थान में भी दीपदान किया जाता है।

मान्यता है कि एकादशी की शाम दीपदान करने से नकारात्मकता दूर होती है और घर में सुख-शांति एवं समृद्धि आती है। इस दिन तुलसी के पत्ते तोड़ने से बचने की परंपरा भी है, इसलिए पूजा के लिए तुलसी दल पहले से रख लेना चाहिए।

दीपक जलाने का मंत्र:

दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः।

दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोस्तुते॥

रमा एकादशी का नाम माता लक्ष्मी से कैसे जुड़ा?

रमा माता लक्ष्मी का एक नाम है। इसी नाम के आधार पर कार्तिक कृष्ण पक्ष की इस एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार माता लक्ष्मी धन, वैभव और समृद्धि की देवी हैं। इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। इसीलिए रमा एकादशी पर दोनों की संयुक्त पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।

रमा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा

पद्म पुराण के उत्तरखंड में रमा एकादशी से जुड़ी राजा मुचुकुंद, उनकी पुत्री चंद्रभागा और दामाद शोभन की कथा मिलती है।

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा मुचुकुंद भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनके राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत श्रद्धा से रखते थे। राजा की पुत्री चंद्रभागा का विवाह शोभन से हुआ था।

एक बार शोभन अपनी पत्नी के साथ राजा मुचुकुंद के महल पहुंचे। उसी दौरान रमा एकादशी का व्रत आया। शोभन शारीरिक रूप से कमजोर थे और उनके लिए भूखे रहना कठिन था। इसके बावजूद उन्होंने एकादशी का व्रत रखने का निर्णय लिया।

व्रत के दौरान कमजोरी और भूख के कारण शोभन की मृत्यु हो गई। लेकिन एकादशी व्रत के पुण्य से उन्हें मंदराचल पर्वत पर एक दिव्य नगर प्राप्त हुआ।

कुछ समय बाद एक ब्राह्मण ने शोभन को देखा और उनकी पत्नी चंद्रभागा तक यह समाचार पहुंचाया। चंद्रभागा ने अपने वर्षों के एकादशी व्रत के पुण्य और श्रद्धा के प्रभाव से उस दिव्य नगर को स्थायी बनाने में सहायता की। इसके बाद वह अपने पति के साथ रहने लगीं।

इस कथा के माध्यम से श्रद्धा, भक्ति और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण का महत्व बताया गया है।

रमा एकादशी पर इन बातों का रखें ध्यान
व्रत के दिन चावल, गेहूं और अन्य अनाज का सेवन न करें।
मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन से परहेज करें।
किसी के प्रति अपशब्द न बोलें और विवाद से बचें।
भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप और भजन-कीर्तन करें।
जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य सामग्री का दान करें।
एकादशी की रात सामर्थ्य के अनुसार भजन और जागरण करें।
द्वादशी के दिन निर्धारित समय में व्रत का पारण करें।

स्वास्थ्य संबंधी परेशानी, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को कठिन निर्जला व्रत रखने के बजाय अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार व्रत करना चाहिए।

रमा एकादशी की आरती

रमा एकादशी पर भगवान विष्णु की आराधना के बाद श्रद्धालु प्रचलित भगवान विष्णु की आरती 'ॐ जय जगदीश हरे' गाते हैं। इसके माध्यम से भक्त भगवान से सुख, शांति, समृद्धि और परिवार की मंगलकामना करते हैं।

रमा एकादशी का पर्व भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के प्रति आस्था प्रकट करने का अवसर है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सच्चे मन से पूजा, व्रत, दान और दीपदान करने से जीवन में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि आती है।
Published By- | 05-Nov-2026 10:54:00 am