हालांकि, बाजार की मौजूदा कमजोरी को देखकर यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत की दीर्घकालिक निवेश क्षमता खत्म हो गई है। बाजार में कुछ चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन कई मजबूत संकेत भी मौजूद हैं।
निफ्टी के प्रदर्शन ने बढ़ाई चिंता
पिछले एक साल में निफ्टी-50 का प्रदर्शन कमजोर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में निफ्टी ने करीब 4.31 प्रतिशत का नकारात्मक रिटर्न दिया है। बाजार में कमजोरी के पीछे वैश्विक परिस्थितियों के साथ घरेलू और विदेशी कारकों का भी असर रहा है।
निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि आने वाले समय में कंपनियों की कमाई और आर्थिक विकास बाजार को किस दिशा में ले जाते हैं।
सर्वे में भारतीय बाजार को कम पसंद किया गया
अगस्त में बैंक ऑफ अमेरिका के फंड मैनेजर्स के सर्वे में भारतीय शेयर बाजार को एशिया के कुछ दूसरे बाजारों की तुलना में कम आकर्षक माना गया। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल करीब 32 प्रतिशत निवेशक भारतीय शेयरों को अंडरवेट मान रहे थे।
वहीं, एशियाई बाजारों में जापान और ताइवान निवेशकों की पसंद में ऊपर रहे। इससे संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक फिलहाल दूसरे बाजारों में ज्यादा अवसर तलाश रहे हैं।
AI और टेक्नोलॉजी में भारत से आगे निकले दूसरे बाजार
भारतीय बाजार को लेकर निवेशकों की बदलती धारणा के पीछे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को भी एक वजह माना जा रहा है।
दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों को सेमीकंडक्टर और AI से जुड़ी कंपनियों का फायदा मिला है। इसके मुकाबले भारतीय प्रमुख शेयर सूचकांकों में ऐसी कंपनियों का वजन अपेक्षाकृत कम है।
इसी वजह से AI और टेक्नोलॉजी से जुड़े निवेश अवसर तलाश रहे विदेशी निवेशकों का एक हिस्सा दूसरे एशियाई बाजारों की ओर देख रहा है।
महंगा वैल्यूएशन भी बनी चुनौती
भारतीय शेयर बाजार में लंबे समय तक तेजी के बाद कई कंपनियों के वैल्यूएशन विदेशी निवेशकों को अपेक्षाकृत महंगे लग रहे हैं। ऐसे में निवेशक सवाल उठा रहे हैं कि मौजूदा कीमतों पर उन्हें कितना अतिरिक्त रिटर्न मिल सकता है।
इसके अलावा भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर भी फिलहाल निवेशकों का उत्साह पहले जैसा नहीं दिख रहा है। हालांकि, दीर्घकाल में भारत की विकास क्षमता को लेकर तस्वीर अभी भी सकारात्मक मानी जाती है।
फिर भी बाजार के लिए कई मजबूत संकेत
बाजार की कमजोर तस्वीर के बीच कुछ आंकड़े राहत भी देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, निफ्टी-50 में शामिल कंपनियों की तिमाही कमाई पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले करीब 18 प्रतिशत बढ़ी है।
वहीं, चालू तिमाही में विदेशी फंड मैनेजरों की ओर से 4 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश भी हुआ है। इससे संकेत मिलता है कि विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई है।
कच्चे तेल और रुपये का भी असर
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने पर तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर भारत पर पड़ता है।
महंगे कच्चे तेल से आयात बिल बढ़ सकता है, महंगाई पर दबाव आ सकता है और रुपये की स्थिति भी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा वैश्विक ब्याज दरें, रुपये में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव भी भारतीय शेयर बाजार के लिए महत्वपूर्ण कारक बने हुए हैं।
क्या आगे फिर लौटेगी बाजार में तेजी?
भारतीय शेयर बाजार की मौजूदा कमजोरी को स्थायी मानना सही नहीं होगा। बाजार में उतार-चढ़ाव सामान्य प्रक्रिया है। विदेशी निवेशक बेहतर रिटर्न की तलाश में समय-समय पर अलग-अलग देशों के बाजारों में पैसा लगाते हैं।
अगर कंपनियों की कमाई मजबूत रहती है, आर्थिक विकास में सुधार आता है और वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल होती हैं, तो भारतीय बाजार में दोबारा तेजी देखने को मिल सकती है।
फिलहाल निवेशकों के लिए सबसे अहम संकेत कंपनियों की कमाई, विदेशी निवेश, डॉलर-रुपया, कच्चे तेल की कीमत और वैश्विक ब्याज दरों की दिशा होगी।