खड़गे और राहुल गांधी का कहना है कि जातिगत आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया पूरी तरह सटीक और विश्वसनीय होनी चाहिए, क्योंकि इन आंकड़ों का उपयोग सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आकलन और सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों को तैयार करने में किया जाएगा।
ओपन-एंडेड सवालों से गड़बड़ी की आशंका
कांग्रेस नेताओं ने पत्र में कहा कि जाति के नाम लिखने के लिए खुले विकल्प देने से आंकड़ों में बड़ी विसंगतियां पैदा हो सकती हैं। उनका तर्क है कि देश के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में एक ही जाति को अलग-अलग नाम, उपजातियों या अलग-अलग वर्तनी से जाना जाता है।
ऐसी स्थिति में एक ही समुदाय के लोगों द्वारा अलग-अलग नाम दर्ज कराने पर उन्हें अलग-अलग समूहों में गिना जा सकता है। कांग्रेस नेताओं ने आशंका जताई कि इससे जातिगत आंकड़ों का सही विश्लेषण करना मुश्किल हो सकता है और वास्तविक जनसंख्या का आकलन प्रभावित हो सकता है।
फिक्स्ड जाति सूची की मांग
खड़गे और राहुल गांधी ने सरकार के सामने वैकल्पिक सुझाव भी रखा है। उन्होंने कहा कि जनगणना में ‘ओपन-एंडेड’ विकल्प के बजाय एक निश्चित या मानकीकृत जाति सूची का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उत्तरदाताओं को अपनी जाति चुनने के लिए निर्धारित विकल्प या ड्रॉप-डाउन सूची दी जा सकती है, जिससे नाम और वर्तनी की भिन्नताओं के कारण होने वाली गलतियों को कम किया जा सके।
उनका कहना है कि ऐसी सूची मौजूदा सरकारी रिकॉर्ड, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की सूची और भारतीय नृविज्ञान सर्वेक्षण के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर तैयार की जा सकती है।
बिहार और तेलंगाना सर्वेक्षण का दिया हवाला
कांग्रेस नेताओं ने अपने पत्र में बिहार और तेलंगाना में हुए जाति सर्वेक्षणों का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि इन राज्यों में निश्चित जाति सूचियों का उपयोग किया गया था। पत्र के साथ संबंधित जाति सर्वेक्षणों की सूचियों की प्रतियां भी संलग्न की गई हैं।
कांग्रेस का मानना है कि मानकीकृत जाति सूची अपनाने से आंकड़ों में बिखराव और त्रुटियों को रोका जा सकता है। अब जनगणना से पहले जातिगत आंकड़े जुटाने के तरीके को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है।