भाव, लय, ताल और नृत्य मुद्राओं के सुंदर समन्वय ने समारोह के मंच को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की विविध परंपराओं से सजा दिया।
गणेश वंदना से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत ओडिसी नृत्य विभाग के विद्यार्थियों की ‘गणेश वंदना’ से हुई। कलाकारों ने नृत्य मुद्राओं और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से भगवान गणेश की आराधना को जीवंत किया।
जया निर्मलकर, सुधा योजन, प्रज्ञा प्रसाद, मीरा वर्मा, दुर्गा प्रसाद, लीना धनकर और रिकी टुडू ने प्रस्तुति दी। इसका नृत्य निर्देशन सुशांत कुमार दास ने किया।
‘नृत्यांजलि’ में दिखी भरतनाट्यम की खूबसूरती
इसके बाद भरतनाट्यम विभाग के विद्यार्थियों ने ‘नृत्यांजलि’ की प्रस्तुति दी। इसमें शास्त्रीय नृत्य की भाव-भंगिमाओं और लयकारी का मनोहारी प्रदर्शन देखने को मिला।
लावण्या आनंद की रचना पर आधारित इस प्रस्तुति का नृत्य संयोजन डॉ. मेदिनी होम्बल और होरिल गौर ने किया। प्रस्तुति में होरिल गौर, प्रीति चौधरी, खुशबू भुमिज, अनुकृति सिंह, अवनि जैन, अदिति शर्मा, अंजलि चौहान और यामिनी निषाद ने सहभागिता की।
‘भारत के रंग’ ने दिखाया सांस्कृतिक वैभव
संध्या की प्रमुख प्रस्तुतियों में ‘भारत के रंग’ ने विशेष आकर्षण पैदा किया। भरतनाट्यम, कथक और ओडिसी के माध्यम से ‘वंदे मातरम्’ की भावभूमि को मंच पर प्रस्तुत किया गया।
तीनों शास्त्रीय नृत्य शैलियों की अलग-अलग मुद्राओं, भाव और लय के जरिए भारत की सांस्कृतिक विविधता की सुंदर झलक देखने को मिली। इसका नृत्य निर्देशन सुशांत कुमार दास और सह-निर्देशन होरिल गौर ने किया।
शिव वंदना में दिखा कथक का आध्यात्मिक रंग
कार्यक्रम के अगले क्रम में कथक विभाग के शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने स्वर्गीय पंडित बिरजू महाराज द्वारा राग हंसध्वनि और तीनताल में रचित ‘निरतत शंकर पार्वती संग’ पर आधारित शिव वंदना प्रस्तुत की।
कथक की लयकारी, पद संचालन और भावाभिव्यक्ति के जरिए भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य स्वरूप को मंच पर साकार किया गया।
शास्त्रीय कलाओं की जीवंत परंपरा दिखी
खैरागढ़ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों ने चक्रधर समारोह की सातवीं सांस्कृतिक संध्या को शास्त्रीय नृत्य की विविधता से समृद्ध किया। विद्यार्थियों की साधना, अनुशासन और सामूहिक समन्वय ने मंच पर भारतीय शास्त्रीय कलाओं की समृद्ध परंपरा को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।