आरक्षण को लेकर हो रहे प्रदर्शनों में शामिल लोगों का कहना है कि वे आरक्षण खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था में सुधार चाहते हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि आरक्षण का लाभ जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भी सहायता बढ़ाई जाए।
दिल्ली में प्रदर्शन, कई लोगों को हिरासत में लिया गया
जाति आधारित आरक्षण और आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर रविवार को सेंट्रल दिल्ली में करीब 300 लोग जुटे। प्रदर्शन के बाद पुलिस ने कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया।
प्रदर्शनकारियों ने ‘क्रीमी लेयर’ के नियम को लागू करने और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने की मांग की। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को भी शिक्षा और रोजगार में आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए।
दलित नेताओं ने किया आरक्षण विरोधी प्रदर्शन का विरोध
आरक्षण को लेकर चल रहे आंदोलन पर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और रामदास अठावले ने कड़ा विरोध जताया है।
चिराग पासवान ने कहा कि आरक्षण कोई खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है। वहीं रामदास अठावले ने आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी आरक्षण में ‘सुधार’ की मांग को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सुधार के नाम पर आरक्षण खत्म करने की कोशिश की जा रही है।
बसपा प्रमुख मायावती ने भी आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग का विरोध किया है। वहीं आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि आरक्षण व्यवस्था में किसी भी तरह की छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जाएगी।
महिला आरक्षण पर BJP-कांग्रेस में वार-पलटवार
जाति आधारित आरक्षण के मुद्दे के बीच महिला आरक्षण को लेकर भी बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हैं।
बीजेपी नेता स्मृति ईरानी ने कांग्रेस से महिला आरक्षण कानून के जल्द लागू होने का समर्थन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण का कानून पारित किया जा चुका है।
वहीं कांग्रेस का कहना है कि पार्टी ने महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन किया था। कांग्रेस सवाल उठा रही है कि कानून को लागू करने के लिए इसे जनगणना और परिसीमन से क्यों जोड़ा गया है।
परिसीमन को लेकर भी बढ़ी सियासी चिंता
महिला आरक्षण के साथ परिसीमन का मुद्दा भी राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। विपक्षी दलों की मांग है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़े बिना लागू किया जाए।
दूसरी ओर, दक्षिणी राज्यों में परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों के संभावित बदलाव को लेकर चिंता जताई जा रही है। सरकार की ओर से इन आशंकाओं को लेकर अलग-अलग मौकों पर स्थिति स्पष्ट की गई है।
आगे क्या होगा?
आरक्षण व्यवस्था, महिला आरक्षण और परिसीमन—तीनों मुद्दे आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकते हैं। खासकर उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अब नजर इस बात पर है कि सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को संसद में कब लाती है और आरक्षण सुधार की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शन पर क्या कदम उठाए जाते हैं।