गणेश प्रतिमाओं के स्वरूप को लेकर इस बार चर्चा भी तेज हो गई है। कुछ धार्मिक संगठनों और धर्मप्रेमियों ने आधुनिक थीम के नाम पर भगवान गणेश की प्रतिमाओं में किए जाने वाले बदलावों पर आपत्ति जताते हुए पारंपरिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप स्वरूप बनाए रखने की अपील की है।
मूल स्वरूप में विराजित हों भगवान गणेश
धर्मप्रेमियों का कहना है कि भगवान गणेश का स्वरूप धार्मिक प्रतीकों और मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। गजमुख, लंबोदर, चार भुजाएं, सुशोभित मस्तक और हाथों में धारण किए जाने वाले आयुध गणेशजी की पारंपरिक पहचान माने जाते हैं।
उनका कहना है कि प्रतिमा निर्माण और सजावट के दौरान भगवान गणेश के मूल स्वरूप और धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
कार्टून और फिल्मी थीम पर जताई आपत्ति
पिछले कुछ वर्षों में गणेश प्रतिमाओं को अलग-अलग आधुनिक थीम में तैयार करने का चलन बढ़ा है। कई जगह भगवान गणेश को कार्टून पात्रों, फिल्मी किरदारों या अन्य स्वरूपों में दिखाया जाता है।
धर्मप्रेमियों का कहना है कि ऐसी प्रतिमाएं लोगों के आकर्षण का केंद्र जरूर बनती हैं, लेकिन धार्मिक स्वरूप में बदलाव को लेकर आस्था और परंपरा से जुड़े सवाल भी उठते हैं।
मूर्तिकारों का दावा- धार्मिक भावनाओं का रखा जा रहा ध्यान
बलौदाबाजार के मूर्तिकारों का कहना है कि इस बार प्रतिमाएं तैयार करते समय धार्मिक भावनाओं के साथ पर्यावरण संरक्षण का भी ध्यान रखा जा रहा है। मिट्टी से प्रतिमाएं बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
मूर्तिकारों के अनुसार श्रद्धालुओं की मांग के मुताबिक अलग-अलग आकार और डिजाइन की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं, लेकिन भगवान गणेश के मूल स्वरूप को बनाए रखने का विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
धार्मिक संगठनों ने की पारंपरिक स्वरूप की अपील
विश्व हिंदू संगठन के पदाधिकारी अभिषेक मिश्रा ने कहा कि भगवान गणेश को उनके मूल स्वरूप से अलग किसी दूसरे स्वरूप में प्रस्तुत करने से धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। उन्होंने गणेश प्रतिमा निर्माण और स्थापना के दौरान धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करने की अपील की।
वहीं, बलौदाबाजार स्थित संकट मोचन मंदिर के पुजारी ने भी श्रद्धालुओं से भगवान गणेश को पारंपरिक और मूल स्वरूप में विराजित करने का आग्रह किया है।
मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देने पर जोर
गणेशोत्सव के दौरान प्रतिमाओं के निर्माण और विसर्जन में पर्यावरण संरक्षण भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। मिट्टी से बनी प्रतिमाएं विसर्जन के बाद अपेक्षाकृत आसानी से घुल जाती हैं, जबकि प्लास्टर ऑफ पेरिस जैसी सामग्री से बनी प्रतिमाओं के विसर्जन से जल स्रोतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
ऐसे में गणेशोत्सव समितियों और मूर्तिकारों से पर्यावरण अनुकूल सामग्री से प्रतिमाएं बनाने और विसर्जन के दौरान जल स्रोतों को सुरक्षित रखने की अपील की जा रही है।
आस्था, परंपरा और पर्यावरण का संतुलन जरूरी
गणेशोत्सव आस्था और भक्ति के साथ-साथ संस्कृति और सामाजिक एकता का भी पर्व है। ऐसे में उत्सव की भव्यता के साथ भगवान गणेश के पारंपरिक स्वरूप, धार्मिक भावनाओं और पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखने की जरूरत है।
बलौदाबाजार में गणेशोत्सव की तैयारियों के बीच अब श्रद्धालुओं और आयोजकों की नजर इस बात पर है कि इस बार गणेश प्रतिमाओं और पंडालों में परंपरा के साथ आधुनिकता का किस तरह संतुलन देखने को मिलेगा।