Friday 4, Apr 2025

धर्म समाज

शुक्रवार को मां लक्ष्मी की पूजा, जानिए...विधि महत्व

मां लक्ष्मी को धन और समृद्धि की देवी कहा जाता है। शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने से सभी आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं और इसके साथ ही शुक्र ग्रह की शुभता से जीवन में धन, समृद्धि और चमक बढ़ती है। इसके साथ ही शुक्रवार के दिन संतोषी माता, देवी दुर्गा और शुक्र ग्रह की पूजा भी की जाती है।
शुक्रवार के दिन क्या करें-
सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।
साफ कपड़े पहनें और मां लक्ष्मी की मूर्ति को उत्तर दिशा की ओर स्थापित करें।
पूजा में दीपक, फूल, लड्डू, चावल, हल्दी, नारियल का प्रयोग करें।
दीपक के साथ वातावरण को शुद्ध करने के लिए धूपबत्ती का प्रयोग करें।
मां लक्ष्मी के मंत्र का जाप करें और आरती करें।
पूजा समाप्त होने के बाद जरूरतमंद लोगों को भोजन, कपड़े और पैसे दान करें।
मां लक्ष्मी की पूजा के लाभ-
सुख, शांति और समृद्धि में वृद्धि- शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने से व्यक्ति के सुख और शांति में वृद्धि होती है। वह हमेशा शांत रहता है और अपना काम ठीक से करता है। इस दिन पूजा करने से परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सौहार्द की भावना भी बढ़ती है और लड़ाई-झगड़ों में कमी आती है।
सुंदरता और आकर्षण में वृद्धि- आत्मविश्वास व्यक्ति के लिए उसके जीवन की सबसे बड़ी चीज होती है। इससे उसके व्यक्तित्व में निखार आता है और वह कोई भी काम बहुत आसानी से कर पाता है। मां लक्ष्मी की पूजा करने से सुंदरता में भी वृद्धि होती है।
शुभ अवसरों में वृद्धि- मां लक्ष्मी की पूजा करने से व्यक्ति को जीवन में नए और शुभ अवसर प्राप्त होते हैं। इसके लिए चाहे वह नौकरी, व्यापार या किसी अन्य क्षेत्र में काम करता हो। इस दिन पूजा करने से व्यक्ति का पूरा जीवन बदल जाता है, जिससे कई बार उसे नए अवसर प्राप्त करने में मदद मिलती है।
पारिवारिक कलह का नाश- शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। परिवार के साथ पूजा करने से आपस में एकता और प्रेम बढ़ता है और कलह का भी नाश होता है।
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चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन करें देवी कालरात्रि को प्रसन्न

  • जानिए...मंत्र और पूजा विधि
आज से चैत्र नवरात्रि की पूजा अपने चरम की ओर बढ़ने लगी है। 30 मार्च से शुरू हुई इस पूजा का आज सातवां दिन है। इस दिन देवी दुर्गा के सातवें स्वरूप देवी कालरात्रि की पूजा का विधान है। आज से माता रानी का पट दर्शन के लिए खोल दिया जाएगा। देवी दुर्गा का यह सातवां स्वरूप हमें जीवन के सबसे बड़े सत्य यानि मृत्यु के सत्य का बोध कराता है। आइए जानते हैं, मां कालरात्रि का स्वरूप क्या है, उनकी पूजा के मंत्र, उनका प्रिय प्रसाद, पुष्प, पूजा विधि, कथा और आरती क्या हैं?
माँ कालरात्रि का स्वरूप कैसा है?
माँ कालरात्रि के चार हाथों में से उठा हुआ दाहिना हाथ वरमुद्रा में है, और नीचे वाला दाहिना हाथ अभयमुद्रा में है। ऊपर वाले बाएं हाथ में तलवार और नीचे वाले बाएं हाथ में कांटा है। माँ कालरात्रि का वाहन गधा है। माता लाल वस्त्र और बाघ की खाल पहने हुए हैं। जैसा कि नाम से पता चलता है, मां का रूप अत्यंत भयानक और भयंकर है। भयानक रूप वाली देवी कालरात्रि अपने भक्तों को शुभ फल प्रदान करती हैं। माँ के बाल घने अँधेरे जैसे गहरे काले हैं। माँ तीन आँखों, बिखरे बालों और भयंकर स्वरूप के साथ दिखाई देती हैं। माता के गले में बिजली के समान चमकती हुई श्वेत माला दिखाई देती है।
माँ कालरात्रि का महत्व-
नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा करने से मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है। देवी माता का यह रूप सभी नकारात्मक ऊर्जाओं, भूतों, राक्षसों और दानवों का नाश करता है। जीवन में हर कोई मृत्यु से डरता है, लेकिन मां कालरात्रि की पूजा करने से व्यक्ति निडर और साहसी बनता है। कई बार कुंडली में प्रतिकूल ग्रहों के प्रभाव के कारण मृत्यु संबंधी अनेक बाधाएं उत्पन्न हो जाती हैं, जिसके कारण व्यक्ति भयभीत एवं चिंतित महसूस करता है। लेकिन मां कालरात्रि अग्नि, जल, शत्रु और पशु आदि के भय से भी मुक्ति दिलाती हैं।
मां कालरात्रि की पूजा विधि-
नवरात्रि के सातवें दिन सबसे पहले स्नान कर साफ-सुथरे कपड़े पहनें।
इसके बाद भगवान गणेश की पूजा करें। फिर रोली, अक्षत, दीप और धूप अर्पित करें।
इसके बाद मां कालरात्रि की फोटो या चित्र स्थापित करें। यदि मां कालरात्रि का चित्र उपलब्ध न हो तो पहले से स्थापित मां दुर्गा के चित्र की पूजा करें।
अब मां कालरात्रि को रात्रि रानी के फूल चढ़ाएं और प्रसाद के रूप में गुड़ का प्रयोग करें.
इसके बाद मां की आरती करें। इसके साथ ही दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा का पाठ करें और मंत्रों का जाप करें।
इस दिन लाल ऊनी आसन बिछाकर लाल चंदन की माला से मां कालरात्रि के मंत्रों का जाप करें। यदि लाल चंदन की माला उपलब्ध न हो तो रुद्राक्ष की माला का भी उपयोग किया जा सकता है।
माँ कालरात्रि के लिए मंत्र, प्रसाद और पुष्प-
माँ कालरात्रि की स्तुति मंत्र: हे देवी, सर्वव्यापी कालरात्रि, पराशक्ति के रूप में विद्यमान हैं। नमस्कार, नमस्कार
मां कालरात्रि का बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चय ॐ कालरात्रि दैव्ये नमः।
मां कालरात्रि का पूजन मंत्र: जय मां कालरात्रि, सबकी जय हो।
प्रिय प्रसाद: मां कालरात्रि को गुड़ बहुत प्रिय है। आप चाहें तो देवी कालरात्रि को गुड़ की खीर या मिठाई का भोग लगा सकते हैं। गुड़ का सेवन करने से देवी मां की कृपा प्राप्त होती है और सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं।
पसंदीदा फूल: मां कालरात्रि को चमेली और नीले कमल के फूल चढ़ाने से आपके जीवन से नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
माँ कालरात्रि की कथा-
एक समय शुम्भ-निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज जैसे राक्षसों का आतंक तीनों लोकों में फैल गया था। उसका तूफान इतना बढ़ गया था कि देवताओं की हालत दयनीय हो गई थी। यह देखकर सभी देवता भगवान शिव के पास गए और उनकी शरण लेकर रक्षा की प्रार्थना करने लगे। भगवान शिव ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध करने और अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए कहा। भगवान शिव ने उनकी बात मान ली और देवी पार्वती ने दुर्गा का रूप धारण कर लिया। फिर उसने शुम्भ और निशुम्भ का वध कर दिया। इसके बाद देवी दुर्गा ने चंड और मुंड नामक राक्षसों का भी वध किया, जिससे उनका नाम 'मां चंडी' पड़ा।
इसके बाद जब मां दुर्गा ने रक्तबीज नामक राक्षस का वध किया तो उनके शरीर से रक्त की धाराएं बहने लगीं। विचित्र बात यह थी कि जैसे ही रक्त जमीन पर गिरा, लाखों रक्तबीज (रक्तबीज) प्रकट होने लगे। यह देखकर देवी दुर्गा ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया। मां कालरात्रि ने उसके शरीर से बहते रक्त को जमीन पर गिरने से पहले अपने मुख में ले लिया। इस प्रकार देवी दुर्गा ने सभी रक्तबीजों का गला काटकर उनका वध कर दिया।
मां कालरात्रि की आरती-
कालरात्रि जय-जय-महाकाली। काल के मुह से बचाने वाली॥
दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा। महाचंडी तेरा अवतार॥
पृथ्वी और आकाश पे सारा। महाकाली है तेरा पसारा॥
खडग खप्पर रखने वाली। दुष्टों का लहू चखने वाली॥
कलकत्ता स्थान तुम्हारा। सब जगह देखूं तेरा नजारा॥
सभी देवता सब नर-नारी। गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥
रक्तदंता और अन्नपूर्णा। कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥
ना कोई चिंता रहे बीमारी। ना कोई गम ना संकट भारी॥
उस पर कभी कष्ट ना आवें। महाकाली मां जिसे बचाबे॥
तू भी भक्त प्रेम से कह। कालरात्रि मां तेरी जय॥
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हनुमान जयंती 12 अप्रैल को, जानिए...पूजा सामग्री

हिंदू पंचांग के अनुसार, हनुमान जयंती यानी चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 12 अप्रैल को सुबह 3 बजकर 21 मिनट पर होगी. साथ ही तिथि का समापन अगले दिन 13 अप्रैल को सुबह 5 बजकर 51 मिनट पर होगा. उदया तिथि के अनुसार, हनुमान जयंती 12 अप्रैल को मनाई जाएगी.
हनुमान जयंती पूजा सामग्री
हनुमान जयंती के दिन पूजा करने के लिए जरूरी सामग्री कुछ इस प्रकार है.-हनुमान जी की मूर्ति, लाल रंग का आसन, वस्त्र, चरण पादुका, जनेऊ, अक्षत्, फल, माला, गाय का घी, दीपक, चमेली का तेल, धूप, इलायची, हनुमान चालीसा, लाल फूल, सिंदूर, पान का बीड़ा, ध्वज, शंख, घंटी, लाल लंगोट, लौंग, मोतीचूर के लड्डू आदि.
हनुमान जयंती पूजा मंत्र
हनुमान जयंति के दिन पूजा में रामचरितमानस और हनुमान चालीसा के अलावा इन खास मंत्रों का जाप जरूर करना चाहिए.
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा!
ऊँ नमो हनुमते रुद्रावताराय विश्वरूपाय अमितविक्रमाय प्रकट-पराक्रमाय महाबलाय सूर्यकोटिसमप्रभाय रामदूताय स्वाहा!
मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
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चैत्र पूर्णिमा पर इस विधि से करें पिंडदान

  • पितरों का मिलेगा आशीर्वाद
हिंदू धर्म में पूर्णिमा की तिथि बहुत पावन मानी गई है. हर माह में एक पूर्णिमा पड़ती है. अभी चैत्र का महीना चल रहा है. इस महीने की समाप्ति पूर्णिमा के दिन होगी. फिर अगले दिन से वैशाख का महीना शुरू हो जाएगा. चैत्र पूर्णिमा के दिन स्नान दान किया किया जाता है. चैत्र पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु गंगा समेत पावन नदियों में स्नान करते हैं. साथ ही दान-पुण्य करते हैं. चैत्र पूर्णिमा के दिन जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन होता है|
इस दिन पूजा के समय भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को श्रीफल और चावल की खीर चढ़ानी चाहिए. चैत्र पूर्णिमा की तिथि पूजा-पाठ के साथ-साथ पितरों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है. इस दिन पितरों का तर्पण और पिंंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और उनको मोक्ष की प्राप्ति होती है. पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि चैत्र पूर्णिमा के दिन किस विधि से पिंडदान करना चाहिए|
कब है चैत्र पूर्णिमा ?
हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 12 अप्रैल को देर रात 3 बजकर 21 मिनट पर हो जाएगी. वहीं इस तिथि की समाप्ति 13 अप्रैल को सुबह सुबह 5 बजकर 51 मिनट पर हो जाएगी. हिंदू धर्म में उदया तिथि मानी जाती है. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, 13 अप्रैल को चैत्र पूर्णिमा मनाई जाएगी|
पिंडदान की विधि
चैत्र अमावस्या के दिन सर्व प्रथम स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें. फिर एक वेदी बनाएं और उस पर पूर्वजों की तस्वीर रखें. फिर वेदी पर काले तिल, जौ, चावल और कुश रखें. इसके बाद गाय के गोबर, आटे, तिल और जौ से एक पिंड बना लें. फिर उस पिंड को पितरों को अर्पित को अर्पित करें. पितरों के मंत्रों का जाप करें. उनको जल अर्पित करें. ध्यान रखें कि पूर्वजों का पिंडदान हमेशा जानकार पुरोहित की उपस्थिति में ही करें. पिंडदान के बाद ब्राह्मणों को भोजन अवश्य कराएं और उनको दान भी दें|
पिंडदान के नियम
पूर्वजों का पिंडदान गंगा या किसी अन्य पवित्र नदी के तट पर जाकर करें. पिंडदान हमेशा दोपहर के समय करें. पूर्वजों के पिंडदान के लिए दोपहर का समय सबसे अच्छा माना जाता है. पिंडदान करते समय, पितरों का ध्यान करें. उनसे आशीर्वाद देने की प्रार्थना करें|
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कामदा एकादशी पर अपनी राशि के अनुसार करें दान, पूरे होंगे रुके हुए काम

एकादशी का व्रत हर माह शुक्ल और कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर रखा जाता है. वहीं चैत्र माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी का व्रत रखा जाता है. कहते हैं इस दिन जगत के पालन हार भगवान विष्णु की सच्चे मन से अराधना करने से व्यक्ति को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है. साथ ही इस व्रत के प्रभाव से जाने-अनजाने में किए गए पापों से भी मुक्ति मिलती है. इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने के साथ राशि के अनुसार दान करने से व्यक्ति को बिगड़े तथा रुके हुए काम बन जाते हैं.
कामदा एकादशी कब है:-
हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी की तिथि की शुरुआत 7 अप्रैल को रात्रि 8 बजे होगी. वहीं तिथि का समापन अगले दिन रात्रि 9 बजकर 12 पर होगी. उदया तिथि के अनुसार, कामदा एकादशी का व्रत मंगलवार 8 अप्रैल को रखा जाएगा.
कामदा एकादशी पर करें इन चीजों का दान
मेष राशि- कामदा एकादशी के दिन लाल रंग की मिठाई और लाल रंग के मौसमी फलों मसूर दाल का दान करें.
वृषभ राशि- चावल, गेहूं, चीनी, दूध आदि चीजों का दान करें.
मिथुन राशि- गाय को चारा खिलाएं और सेवा करें. साथ ही जरूरतमंद लोगों को हरी सब्जियों का दान करें.
कर्क राशि- माखन, मिश्री, लस्सी, छाछ आदि चीजों का दान करें.
सिंह राशि- कामदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद राह चलते लोगों में लाल रंग के फल और शरबत बाटें.
कन्या राशि- विवाहित महिलाओं को हरे रंग की चूड़ियां दान में दें.
तुला राशि- भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद जरूरतमंदों के मध्य सफेद वस्त्रों का दान करें.
वृश्चिक राशि- मसूर दाल, लाल मिर्च, लाल रंग के फल आदि चीजों का दान करें.
धनु राशि- केसर मिश्रित दूध राहगीरों में बाटें. साथ ही पीले रंग के फल और खाने पीने की अन्य चीजों का भी दान कर सकते हैं.
मकर राशि- भगवान विष्णु की पूजा करने के साथ गरीबों के मध्य धन का दान करें.
कुंभ राशि- कामदा एकादशी पर चमड़े के जूते-चप्पल, छतरी और काले वस्त्र का दान करें.
मीन राशि- केला, चने की दाल, बेसन, पीले रंग के वस्त्र का दान करें.

 

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अष्टमी और नवमी तिथि पर कब होगा कन्या पूजन, जानिए...सही तिथि, सामग्री और पूजा विधि

हिंदू धर्म में कन्याओं को मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है. लोग अष्टमी और नवमी तिथि को कन्याओं का पूजन तथा भोजन कराते हैं. चैत्र नवरात्रि की शुरुआत इस साल 30 मार्च से हुई, जिसका समापन 6 अप्रैल को रविवार को होगा. इस बार चैत्र नवरात्रि सिर्फ 8 दिन की है, जिसके वजह से अष्टमी और नवमी तिथि और कन्या पूजन को लेकर कुछ असमंजस की स्थिति बनी हुई है. ऐसे में कन्या पूजन कब और कैसे करें? आइए जानते हैं|
वैदिक पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि के शुरुआत 4 अप्रैल को रात 8 बजकर 12 मिनट पर होगी. वहीं तिथि के समापन 5 अप्रैल को शाम 7 बजकर 26 मिनट पर होगी, जिसके बाद महानवमी तिथि का शुरुआत हो जाएगी जो कि 6 अप्रैल को शाम 7 बजकर 22 मिनट पर समाप्त हो जाएगी. ऐसे में अष्टमी तिथि का कन्या पूजन 5 अप्रैल और महानवमी 6 अप्रैल को होगी|
कन्या पूजन की सामग्री-
कन्याओं का पैर धोने के लिए साफ जल, और कपड़ा, बैठना के लिए आसन, गाय के गोबर से बने उपले, पूजा की थाली, घी का दीपक, रोली, महावर, कलावा ,चावल, फूल, चुन्नी, फल, मिठाई, हलवा-पूरी और चना, भेंट और उपहार|
कन्या पूजन विधि-
कंजक पूजन के लिए अष्टमी या नवमी के दिन सुबह जल्दी उठकर घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई करें. फिर स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें. इसके बाद भगवान गणेश और महागौरी की पूजा करें. कन्या पूजन के लिए कन्याओं को और एक बालक को आमंत्रित करें. जब कन्याएं घर में आए तो माता का जयकारा लगाएं. उसके बाद सभी कन्याओं का पैर खुद अपने हाथों से धुलें और पोछें. इसके बाद उनके माथे पर कुमकुम और अक्षत का टीका लगाएं. फिर उनके हाथ में मौली या कलावा बाधें. एक थाली में घी का दीपक जलाकर सभी कन्याओं की आरती उतारें. आरती के बाद सभी कन्याओं हलवा-पूरी, चना का भोग लगाएं. भोजन के बात अपनी सामर्थ अनुसार कन्याओं को कुछ न कुछ भेंट जरूर दें. आखिरी में कन्याओं का पैर छूकर उनका आशीर्वाद जरूर प्राप्त करें|
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चैत्र नवरात्रि के छठे दिन पूजा में पढ़ें मां कात्यायनी की कथा

  • विवाह में आ रही रुकावटें होंगी दूर
शास्त्रों में देवी कात्यायनी के स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि वे चार भुजाधारी हैं. माता एक हाथ में तलवार, दूसरे में पुष्प, तीसरा हाथ अभय मुद्रा में है और चौथा वर मुद्रा में है. मान्यता है कि मां कात्यायनी की पूजा करने से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों की प्राप्ति हो जाती है. इनके पूजन से शुक्र की स्थिति बेहतर होती है और वैवाहिक जीवन में आने वाली सभी समस्याएं दूर होती हैं| हिंदू धर्म में नवरात्रि का खास महत्व है. इस दौरान मां भगवती के नौ रूपों के अराधना की जाती है. वहीं नवरात्रि के छठवें दिन मां आदिशक्ति के कात्यायनी स्वरूप की पूजा की जाती है. इनका जन्म महर्षि कात्यायन के घर हुआ था, इसलिए इनका नाम कात्यायनी पड़ा|
मां कात्यायनी की कथा-
पौराणिक कथा के अनुसार, वनमीकथ का नाम के महर्षि थे, उनका एक पुत्र था जिसका नाम कात्य रखा गया. इसके बाद कात्य गोत्र में महर्षि कात्यायन ने जन्म लिया, उनकी कोई संतान नहीं थी. उन्होंने मां भगवती को पुत्री के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती ने उन्हें साक्षात दर्शन दिया. उसके बाद महर्षि कात्यायन ने माता से वरदान मांगा कि वह उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें. मां भगवाती ने भी उन्हें वचन दिया कि वह उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लेंगी. एक बार तीनों लोकों पर महिषासुर नाम के एक दैत्य ने अत्याचर करना शुरु कर दिया. उसके अत्यचारों से तंग आकर सभी देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी से सहयता मंगी|
तब त्रिदेव के तेज से माता ने महर्षि कात्यायन के घर जन्म लिया. इसलिए माता के इस स्वरूप को कात्यायनी के नाम से जाना जाता है. माता के पुत्री के रूप में पधारने के बाद महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले उनकी पूजा की. तीन दिनों तक महर्षि की पूजा स्वीकार करने के बाद माता ने वहां से विदा ली और महिषासुर, शुंभ निशुंभ समेत कई राक्षसों के आतंक से संसार को मुक्त कराया. माता कात्यायनी को ही महिषासुरमर्दिनी के नाम से भी जाना जाता है|
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2 मई से खुलेंगे केदारनाथ धाम के कपाट, पैदल मार्ग को किया जा रहा दुरुस्त

रुद्रप्रयाग। विश्व प्रसिद्ध श्री केदारनाथ धाम की यात्रा 2 मई से शुरू होने वाली है। इससे पहले जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और अन्य संबंधित टीमें यात्रा की तैयारियों में जुट गई हैं। मकसद है कि कपाट खुलने से पहले सारी व्यवस्थाएं दुरुस्त हो जाएं, ताकि यात्रा सुगम और भव्य तरीके से चल सके।
मुख्य विकास अधिकारी डॉ. जीएस खाती ने बताया कि सड़क मार्ग से लेकर केदारनाथ के पैदल रास्तों को तेजी से ठीक किया जा रहा है। आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की टीमें पैदल मार्गों पर जमी मोटी बर्फ को हटाने में दिन-रात लगी हैं। पिछले साल आई आपदा से टूटे रास्तों की मरम्मत भी की जा रही है। डॉ. खाती ने कहा, "हमारा लक्ष्य है कि श्रद्धालुओं को किसी परेशानी का सामना न करना पड़े। इसके लिए युद्ध स्तर पर काम चल रहा है।"
वहीं, मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. रामप्रसाद ने बताया कि इस बार केदारनाथ धाम में 17 बेड का अस्पताल तैयार हो रहा है। जैसे ही बर्फ हटाने का काम पूरा होगा, स्वास्थ्य विभाग की टीमें जरूरी सामान के साथ व्यवस्था जुटाने में लग जाएंगी। उन्होंने कहा, "गौरीकुंड से केदारनाथ तक पैदल मार्ग पर सभी मेडिकल रिलीफ पॉइंट्स को ठीक किया जा रहा है। फाटा में इस बार हड्डी विशेषज्ञ डॉक्टर और एक्स-रे मशीन की सुविधा भी उपलब्ध होगी।"
इसके अलावा, यात्रा के लिए डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की मांग शासन से की गई है। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की टीमें यह सुनिश्चित करने में जुटी हैं कि श्रद्धालुओं को किसी तरह की दिक्कत न हो। बर्फबारी और आपदा के बाद रास्तों को सुरक्षित बनाना बड़ी चुनौती है। लेकिन, तैयारियां तेजी से चल रही हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु केदारनाथ धाम के दर्शन के लिए आते हैं। इस बार भी प्रशासन यात्रा को सफल बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। जैसे-जैसे कपाट खुलने की तारीख नजदीक आ रही है, तैयारियों में और तेजी लाई जा रही है।
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रामनवमी पर 18 घंटे दर्शन देंगे रामलला, आरती का बदलेगा समय

अयोध्या। अयोध्या में रामनवमी बड़ी धूम-धाम से मनाई जाएगी। चैत्र नवरात्रि और रामनवमी के चलते राम मंदिर में हर दिन भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है और रामलला के दर्शन कर रहे है। इसी को देखते हुए मंदिर प्रशासन रामजन्मोत्सव पर रामलला के दर्शन की अवधि बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। रामनवमी पर रामलला 18 घंटे अपने भक्तों को दर्शन देंगे।
भारी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद
रामनवमी पर रामलला के दर्शनों का समय बढ़ाने की जानकारी मिली है, लेकिन श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अभी तक इसकी अधिकारिक घोषणा नहीं की है। अनुमान लगाया गया है कि रामनवमी मेले पर 20 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। आखिरी तीन दिनों में भारी संख्या में भक्तों के आने की उम्मीद है। इसी को देखते हुए तीनों दिनों के दौरान रामलला के दर्शन अवधि में बदलाव किए जाने की तैयारी है। ताकि अधिक से अधिक श्रद्धालु दर्शन कर सकें और किसी को बिना दर्शन किए न लौटना पड़े।
इतने बजे तक खुलेंगे मंदिर के कपाट
रामनवमी पर राम मंदिर के कपाट सुबह पांच बजे से लेकर रात 11 बजे तक खुलेगे। इस दौरान श्रद्धालु अपने रामलला के दर्शन कर सकेंगे। आरती के समय में भी बदलाव किए जाने की संभावना है। श्रद्धालुओं की सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किए गए है। प्रशासन ने पेयजल समेत सभी नागरिक सुविधाओं के पुख्ता इंतजाम किए हैं।
महासचिव चंपत राय ने की अपील
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय ने नवमी मेले में आने वाले श्रद्धालुओं से अनुरोध किया है कि वे गर्मी को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों के साथ अयोध्या आयें। ट्रस्ट के महासचिव राय ने कहा है कि आने वाले दिनों में तापमान और बढ़ने की उम्मीद है। उन्होंंने कहा कि प्रतिदिन करीब 70,000 से 80,000 श्रद्धालु भगवान रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या आ रहे हैं। इस समय दिन का तापमान 35 डिग्री
सेल्सियस के आसपास चल रहा है, जो आने वाले दिनों में 45 डिग्री सेल्सियस और 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।'' उन्होंने कहा, ‘‘ऐसी स्थिति में मेरी सलाह है कि श्रद्धालु धूप से बचने के लिए सिर पर टोपी, पगड़ी या तौलिया बांधकर निकलें। अगर आप गिलास के साथ नींबू, चीनी, नमक या ओआरएस का घोल रख सकें तो बहुत अच्छा रहेगा। बेहतर होगा कि जौ का सत्तू अपने साथ लायें यह न केवल लू से बचाएगा, बल्कि पेट संबंधी कोई समस्या भी नहीं होगी।''
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भगवान गणेश की कृपा से मिलेगा सुख-समृद्धि और सफलता का वरदान

  • जानिए...बुधवार के आसान उपाय
भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता के रूप में पूजा जाता है। उनकी कृपा से सभी बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार होता है। गणपति की आराधना करने से व्यक्ति को न केवल सफलता मिलती है, बल्कि उसकी सभी इच्छाएं भी पूर्ण होती हैं।
गणेश जी को बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि का दाता माना जाता है। जो भी सच्चे मन से उनका ध्यान करता है, उसे कार्यों में सफलता प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। खासकर किसी भी नए कार्य की शुरुआत से पहले गणपति जी की पूजा करना शुभ माना जाता है, जिससे कार्य में कोई रुकावट न आए और सफलता प्राप्त हो।
उनकी कृपा से न केवल आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है, बल्कि परिवार में भी सुख-शांति बनी रहती है। उनकी उपासना से आत्मबल और आत्मविश्वास बढ़ता है, जिससे व्यक्ति हर चुनौती का सामना करने में सक्षम हो जाता है। इसलिए, जो भी श्रद्धा और भक्ति से गणपति जी की आराधना करता है, उसे सुख-समृद्धि, सफलता और शुभ फल की प्राप्ति होती है।
बुधवार के आसान उपाय-
सुबह उठकर स्नान करने के बाद गणेश जी की पूजा करें। गणेश जी के मंदिर में जाकर दूर्वा की 11 या 21 गांठें चढ़ाने से विशेष लाभ मिलता है। अगर आप किसी काम में बार-बार असफल हो रहे हैं तो बुधवार से श्री गणेश के मंत्र का जाप करना शुरू कर दें।बुधवार के दिन श्री गणेश की विधिवत पूजा करने के बाद उन्हें गुड़ और घी का भोग लगाएं। कुछ देर बाद यह भोग गाय को खिला दें, इससे विशेष फल मिलता है। घर में गणेश जी की सफेद रंग की मूर्ति स्थापित करना बहुत शुभ माना जाता है।
बुधवार के दिन गणपति को मोदक का प्रसाद चढ़ाने और ग्रहण करने से घर में शांति बनी रहती है और सुख-समृद्धि आती है। इस दिन गणेश जी को शमी के पत्ते चढ़ाने से बुद्धि तेज होती है और पारिवारिक कलह भी नष्ट होते हैं। बुधवार के दिन गणेश जी को केसरिया सिंदूर अर्पित करना चाहिए। दरिद्रता और संकट दूर होकर घर में समृद्धि आती है। बुधवार के दिन जरूरतमंदों को हरे चने का दान करने से रिश्तों में आई खटास दूर होती है। अगर आपका राहु कमजोर है तो बुधवार की रात को अपने सिरहाने एक नारियल रखकर सोएं और अगले दिन गणेश जी के मंदिर में जाकर वह नारियल अर्पित करें। इसके साथ ही विघ्नहर्ता गणेश स्त्रोत का पाठ करें। इससे राहु के बुरे प्रभाव से बचाव होता है।
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चैत्र नवरात्रि में मां कूष्मांडा की उपासना से मिलेगा दीर्घायु और यश

Chaitra Navratri : नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा की पूजा के लिए शुभ माने जाते हैं। इस दौरान मां शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री माता तक की पूजा की जाती है। दुर्गा नवमी के दिन हवन और विसर्जन के साथ इसका समापन होता है। देवी भागवत पुराण के अनुसार मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठ हैं। नवरात्रि के दौरान भारत में स्थापित शक्तिपीठों के दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है। आइए जानते हैं मां दुर्गा के 9 शक्तिपीठों और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में। नवरात्रि हिंदू धर्म के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। इस साल चैत्र नवरात्रि 06 अप्रैल को समाप्त होगी। यह नौ दिनों का त्योहार है जो दिलचस्प उत्सव अनुष्ठानों से भरा होता है। नवरात्रि देवी दुर्गा और उनके नौ अवतारों की पूजा के लिए समर्पित है। क्या आप जानते हैं कि साल में चार नवरात्रि होती हैं, लेकिन केवल दो शरद नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि ही बड़े पैमाने पर मनाई जाती हैं। व्रत के दौरान नौ दिनों तक मांस, अनाज, शराब, प्याज और लहसुन का सेवन वर्जित होता है।
शक्तिपीठ से जुड़ी कथा-
माता शक्तिपीठ से जुड़ी कथा का वर्णन पुराणों में भी मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के शव को लेकर धरती पर तांडव करने लगे थे। तब भगवान विष्णु ने शिव के क्रोध को शांत करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के शव के टुकड़े कर दिए। इस क्रम में जहां-जहां सती के शरीर के अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए।
मां दुर्गा के 9 प्रमुख शक्तिपीठ-
1. कालीघाट मंदिर कोलकाता - चार उंगलियां गिरी
2. कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर - त्रिनेत्र गिरा
3. अंबाजी मंदिर गुजरात - हृदय गिरा
4. नैना देवी मंदिर - आंखें गिरना
5. कामाख्या देवी मंदिर - यहां गुप्तांग गिरे
6. हरसिद्धि माता मंदिर उज्जैन - यहां बायां हाथ और होंठ गिरे
7. ज्वाला देवी मंदिर - सती की जीभ गिरी
8. कालीघाट में मां के बाएं पैर का अंगूठा गिरा।
9. वाराणसी - उत्तर प्रदेश के काशी में मणिकर्णिक घाट पर विशालाक्षी की मां की माला गिरी।
पूजा का महत्व और लाभ-
मां कुष्मांडा की उपासना से भक्तों के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। मान्यता है कि उनकी कृपा से सभी प्रकार के रोगों का नाश होता है और व्यक्ति को आरोग्यता की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से देवी की उपासना करने से दीघार्यु, यश और कीर्ति की प्राप्ति होती है। इस दिन भक्त मां को सफेद वस्त्र, सफेद फूल और कद्दू का भोग अर्पितकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
अष्टमी और नवमी कब है-
इस बार चैत्र नवरात्रि की महाअष्टमी और महानवमी का संयोग देखने को मिल रहा है, क्योंकि इस बार पंचमी तिथि क्षय हो रही है। ऐसे में 8 दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाएगी। इस प्रकार 5 अप्रैल को चैत्र नवरात्रि की अष्टमी तिथि की पूजा की जाएगी और उसी दिन कन्या पूजन भी किया जाएगा. इसके साथ ही अगले दिन यानी 6 अप्रैल को चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि की पूजा और राम नवमी का त्योहार मनाया जाएगा।
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अप्रैल का महीना सनातन धर्म में खास महत्व रखता है। इस महीने में चैत्र नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की पूजा होती है, जिसमें व्रत और कन्या पूजन का विशेष महत्व है। इसके अलावा कई अन्य व्रत और पर्व भी इस माह में मनाए जाते हैं। आइए जानते हैं कि अप्रैल 2025 के प्रमुख व्रत और त्योहारों की डेट क्या है...
अप्रैल 2025 के व्रत-त्योहार की लिस्ट-
01 अप्रैल- मासिक कार्तिगाई और विनायक चतुर्थी
02 अप्रैल - लक्ष्मी पञ्चमी
03 अप्रैल - यमुना छठ, रोहिणी व्रत और स्कन्द षष्ठी
05 अप्रैल - मासिक दुर्गाष्टमी
06 अप्रैल - राम नवमी और स्वामीनारायण जयंती
08 अप्रैल - कामदा एकादशी
09 अप्रैल - वामन द्वादशी
10 अप्रैल - महावीर स्वामी जयन्ती, प्रदोष व्रत
12 अप्रैल - हनुमान जयंती और चैत्र पूर्णिमा
13 अप्रैल- वैशाख माह की शुरुआत
14 अप्रैल- मेष संक्रान्ति
16 अप्रैल- विकट संकष्टी चतुर्थी
20 अप्रैल- भानु सप्तमी, कालाष्टमी और मासिक कृष्ण जन्माष्टमी
24 अप्रैल- वरुथिनी एकादशी व्रत
25 अप्रैल- प्रदोष व्रत
26 अप्रैल- मासिक शिवरात्रि
27 अप्रैल- वैशाख अमावस्या
29 अप्रैल- परशुराम जयंती और मासिक कार्तिगाई
30 अप्रैल- अक्षय तृतीया और रोहिणी व्रत
चैत्र नवरात्र 2025 कैलेंडर-
पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होगी।
दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी।
तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होगी।
चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होगी।
पांचवे दिन मां स्कंदमाता की पूजा होगी।
छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा होगी।
सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा होगी।
आठवें दिन मां महागौरी की पूजा होगी।
नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होगी।
कन्या पूजन 2025 की तारीख-
चैत्र नवरात्र में कन्या पूजन का बहुत महत्व होता है। कन्याओं का खाना खिलाने के बाद पूजन करना बहुत ही शुभ माना जाता है। इससे माता रानी प्रसन्न होती है। इस साल चैत्र नवरात्र में अष्टमी 5 अप्रैल और नवमी 6 अप्रैल को मनाई जाएगी, जिसमें कन्या पूजन होगा।
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चैत्र नवरात्र के चौथे दिन मां कुष्माण्डा की उपासना

  • जानिए...पूजन विधि और प्रिय भोग
आज चैत्र नवरात्र का चौथा दिन है. नवरात्र के चौथे दिन मां कुष्माण्डा का पूजन  होता है. अपनी हल्की हंसी के द्वारा ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कुष्माण्डा हुआ. ये अनाहत चक्र को नियंत्रित करती हैं. मां की आठ भुजाएं हैं. अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं. संस्कृत भाषा में कूष्माण को कुम्हड़ कहते हैं और इन्हें कुम्हड़ा विशेष रूप से प्रिय है. ज्योतिष में इनका संबंध बुध ग्रह से है.
देवी कुष्माण्डा की पूजा विधि और लाभ
नवरात्र के चौथे दिन हरे वस्त्र धारण करके मां कुष्माण्डा का पूजन करें. पूजा के दौरान मां को हरी इलाइची, सौंफ या कुम्हड़ा अर्पित करें. इसके बाद उनके मुख्य मंत्र "ॐ कुष्मांडा देव्यै नमः" का 108 बार जाप करें. चाहें तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें.
बुध को मजबूत करने के लिए करें मां कुष्मांडा की पूजा
मां कुष्माण्डा को उतनी हरी इलाइची अर्पित करें जितनी कि आपकी उम्र है. हर इलाइची अर्पित करने के साथ "ॐ बुं बुधाय नमः" कहें. सारी इलाइचियों को एकत्र करके हरे कपडे में बांधकर रख लें. इन्हें अपने पास अगली नवरात्रि तक सुरक्षित रखें.
मां कुष्माण्डा का विशेष प्रसाद
इस दिन मां को आज के दिन मालपुए का भोग लगाएं. इसके बाद उसको किसी ब्राह्मण या निर्धन को दान कर दें. इससे बुद्धि का विकास होने के साथ-साथ निर्णय क्षमता अच्छी हो जाती है. आप चाहें तो देवी को पीले रंग की मिठाई या फल का भी भोग लगा सकते हैं.
मां कुष्‍मांडा पूजा मंत्र
1. बीज मंत्र: कुष्मांडा: ऐं ह्री देव्यै नम:
2. ध्यान मंत्र: वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
3. पूजा मंत्र: ॐ कुष्माण्डायै नम:
4. या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
5. ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।
 
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विनायक चतुर्थी पर सुनें ये व्रत कथा, वैवाहिक जीवन होगा सुखमय

हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत आज सुबह 5 बजकर 42 मिनट पर हो चुकी है. वहीं इस तिथि का समापन कल 2 अप्रैल को देर रात 2 बजकर 32 मिनट पर होगा. हिंदू धर्म उदया तिथि मान्य है. ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, आज विनायक चतुर्थी है. इसका व्रत भी आज है|
हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश की पूजा और व्रत किया जाता है. हर माह की चतुर्थी तिथि संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाई जाती है. वहीं हर माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि विनायक चतुर्थी के रूप में मनाई जाती है. विनायक चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा और व्रत करने से जीवन के सभी विघ्न दूर हो जाते हैं. इस दिन पूजा के समय विनायक चतुर्थी की कथा भी अवश्य पढ़नी या सुननी चाहिए. ऐसा करने पूजा और व्रत का पूरा फल मिलता है. साथ ही वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है|
विनायक चतुर्थी व्रत कथा-
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक धर्मनीष्ठ राजा राज किया करते थे. वो राजा बहुत आदर्शवादी और धर्मात्मा थे. उनके राज्य में एक विष्णु शर्मा नाम के ब्राह्मण थे. वो भी सज्जन और धर्मात्मा थे. वो सामान्य तरह से जीवन यापन करते थे. उनके सात पुत्र थे. विवाह के बाद सभी पुत्र अलग हो गए. विष्णु शर्मा भगवान गणेश के भक्त थे. वो हमेशा संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा करते थे, लेकिन बुढ़ापे की अवस्था में उनके लिए गणेश चतुर्थी के व्रत का पालन करना मुश्किल हो रहा था. इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न मेरे स्थान पर मेरी बहुएं इस व्रत को रखें|
एक दिन उन्होंने सभी पुत्रों को अपने घर बुलाया. शाम को भोजन के बाद उन्होंने अपनी सभी बहुओं से यह व्रत करने को कहा. बहुओं ने व्रत करने से सिर्फ मना किया बल्कि ब्राह्मण अपने ससुर जी को खूब अपमानित किया. हालांकि सबसे छोटी बहु ने उनकी बात मान ली. उसने पूजा में लगने वाली सभी सामान की व्यवस्था की. ससुर के साथ खुद भी व्रत रखा. स्वंय कुछ नहीं खाया, लेकिन सुसर जी को भोजन दे दिया|
आधी रात में ब्राह्मण की तबियत अचानक खराब हो गई. उन्हें दस्त और उल्टियां होने लगी. छोटी बहु ने मल-मूत्र से खराब हुए ससुर जी के वस्त्र साफ किए और उनके शरीर को धोया और स्वच्छ किया. वो पूरी रात बिना कुछ खाए- पिए ससुर जी की सेवा में लगी रही. व्रत के दौरान चंन्द्रोदय होने पर उसने स्नान कर भगगवान गणेश की पूजा की. व्रत का विधि पूर्वक पारण किया. छोटी बहु की व्रत और पूजा से भगवान श्री गणेश प्रसन्न हुए|
फिर भगवान गणेश की कृपा से ससुर जी के सेहत में सुधार होने लगा. व्रत और पूजा के पुण्यफल से छोटी बहु का घर धन के भंडार से भर गया. ये देख अन्य बहुओं को अपनी भूल पर पछतावा होने लगा. इसके बाद उन्होंने अपने ससुर जी से क्षमा मांगी. इसके बाद उन्होंने भी शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली विनायक चतुर्थी का व्रत रखा और विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा की. ऐसे में सब पर भगवान गणेश की कृपा हुई. भगवान गणेश की कृपा से सभी के स्वभाव में सुधार आ गया|
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नवरात्रि में कब है लक्ष्मी पंचमी, जानिए...शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम

हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि की शुरुआत 2 अप्रैल को बुधवार देर रात 2 बजकर 32 मिनट पर हो जाएगी. वहीं इस तिथि का समापन 2 अप्रैल को ही रात में 11 बजकर 49 मिनट पर हो जाएगा. ये ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, 2 अप्रैल बुधवार को ही लक्ष्मी पंचमी का व्रत रखा जाएगा और माता लक्ष्मी का पूजन किया जाएगा|
हिंदू धर्म में लक्ष्मी पंचमी का व्रत बहुत विशेष माना जाता है. दरअसल, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि लक्ष्मी पंचमी के रूप में मनाई जाती है. चैत्र नवरात्रि की पंचमी तिथि लक्ष्मी पंचंमी कही जाती है. इस दिन इसका व्रत और माता लक्ष्मी का पूरे विधि-विधान से पूजन किया जाता है. इस दिन पूजन करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं. उनके आशीर्वाद से घर धन-धान्य से भर जाता है. चैत्र नवरात्रि शुरू हो चुकी है. ऐसे में आइए जानते हैं कि कब है लक्ष्मी पंचमी. इसका शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम क्या हैं|
लक्ष्मी पंचमी पूजा विधि-
लक्ष्मी पंचमी के दिन सर्वप्रथम जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करना चाहिए. फिर साफ वस्त्र धारण करने चाहिए. फिर पूजास्थल की साफ-सफाई करनी चाहिए. इसके बाद एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर, माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर रखनी चाहिए. इसके बाद पहले भगवान गणेश की उपासना करनी चाहिए. फिर माता लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए. पूजा के दौरान माता लक्ष्मी को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए. माता लक्ष्मी को गंध, पुष्प, फल, चंदन, सुपारी, रोली और मोली चढ़ानी चाहिए. माता को मिठाई का भोग भोग लगाना चाहिए. उसके सामने धूप-दीप जलाना चाहिए. पूजा के समय लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. माता लक्ष्मी के विभिन्न मंत्रों का जाप करना चाहिए. लक्ष्मी पंचमी कथा का पाठ करना या सुनना चाहिए. फिर माता की आरती कर पूजा का समापन करना चाहिए|
लक्ष्मी पंचमी के नियम-
इस दिन व्रत में फल, दूध, और मिठाई का सेवन करें.
ब्राह्मणों को भोजन कराएं.
माता लक्ष्मी को पीली कौड़ी चढ़ाएं.
चांदी से संबंधित चीजों का दान न करें.
तेल का दान न करें.
व्रत में मांसाहार और मदिरा का सेवन न करें. लहसुन प्याज खाने से बचें|
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हर मंगलवार रखें हनुमान जी का व्रत, दूर होगी हर समस्या

मंगलवार का दिन हनुमान जी के लिए समर्पित होता है, ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से बजरंगबली अपने भक्तों पर खास कृपा बरसाते हैं. वैसे हनुमान जी की हर दिन पूजा की जाती है, लेकिन मंगलवार को हनुमान जी की पूजा का खास महत्व है. मान्यता है कि जो लोग शनि से पीड़ित हैं, वो मंगलवार का व्रत करें तो उनके ऊपर से शनि का दोष खत्म हो जाएगा|
मंगलवार को व्रत रखने के फायदे-
मान्यता है कि अगर आप मांगलिक दोष से पीड़ित हैं, तो आपके लिए मंगलवार का व्रत करना काफी फायदेमंद हो सकता है. पूरे श्रद्धा के साथ हनुमान जी की आराधना करते हैं, तो आपका मांगलिक दोष दूर हो जाएगा. अगर आपके घर में आर्थिक तंगी हैं और कर्ज के बोझ तले दबे हैं, तो अगर आप मंगलवार को व्रत करें. व्रत करने से आपकी आर्थिक परेशानियां दूर हो जाएंगी. शादीशुदा जिंदगी में चली आ रही परेशानियों से भी मंगलवार को व्रत रखने से छुटकारा मिलता है. हनुमान जी को संकट मोचन कहा जाता है, इसलिए उनका व्रत रखने से हर तरह के संकट दूर हो जाते हैं|
कैसे शुरू करें व्रत-
मंगलवार का व्रत किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार से शुरू कर सकते हैं, आप 21 व्रत रख सकते हैं. मान्यता है कि 21 व्रत करने से सारी मनोकामना पूरी होती है. मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा का पाठ करना शुभ माना जाता है. इसके अलावा मंगलवार के दिन बजरंग बाण और सुंदरकांड का पाठ भी करना शुभ माना जाता है|
मंगलवार पूजा विधि-
मंगलवार के दिन आप ब्रह्म मुहू्र्त में उठकर नहाकर सूर्यदेव को जल चढ़ाकर व्रत की शुरुआत करें. आप अपने घर में ईशान कोण में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर हनुमान जी की तस्वीर रखें. हनुमान जी के साथ भगवान श्री राम और सीता की पूजा करने से व्रत का फल जल्द मिलता है. भोग में बूंदी के लड्डू जरूर चढ़ाएं. इसके साथ तुलसी के पत्ते का भी इस्तेमाल करें|
ऐसी मान्यता है कि बजरंग बली को तुलसी के पत्तों से काफी लगाव है. पूजा में रोली अक्षत जरूर रखें और बजरंग बली को लाल रंग का फूल चढ़ाएं. पूजा के दौरान हनुमान चालीसा का पाठ जरूर करें. पूजा करने के बाद आरती करें और सबको प्रसाद बांटे शाम को भी बजरंगबली की एक बार फिर पूजा और आरती करके आप शाम को मीठा भोजन कर सकते हैं|
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तीसरे दिन ऐसे करें मां चंद्रघंटा की पूजा, मिलेगा भरपूर शुभता

Chaitra Navratri : आज चैत्र नवरात्रों के दो दिन पूरे हो चुके हैं, जबकि तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा अर्चना की जाती है। माना जाता है कि इस दिन माता चंद्रघंटा की पूजा-उपासना करने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इसलिए तो चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन मां की पूजा अर्चना करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, जीवन में खुशहाली आती है और सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। मां चंद्रघंटा की पूजा से न केवल भौतिक सुख में वृद्धि होती है, बल्कि समाज में आपका प्रभाव भी बढ़ता है। बता दें कि इस बार द्वतीया और तृतीया नवरात्री व्रत एक ही दिन किया जाएगा। आइए जानते हैं मां चंद्रघंटा की पूजाविधि, भोग, पूजा मंत्र और आरती के बारे में।
मां चंद्रघंटा की पूजा से जीवन के सभी पहलुओं में सफलता प्राप्त होती है। विशेष रूप से, इस दिन सूर्योदय से पहले पूजा करनी चाहिए, क्योंकि इस समय मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है। पूजा में लाल और पीले गेंदे के फूल चढ़ाने का महत्व है, क्योंकि ये फूल मां की ममता और शक्ति का प्रतीक हैं। मां चंद्रघंटा के मस्तक पर अर्द्धचंद्र के आकार का घंटा स्थित है, जो उनकी महिमा और तेजस्विता को दर्शाता है। यही कारण है कि देवी का नाम चंद्रघंटा पड़ा।
चंद्रघंटा मां का मंत्र-
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥
ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:
पूजा के उपाय-
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठे : सुबह जल्दी उठें और स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहने।
मां चंद्रघंटा को पीले रंग की मिठाई और दूध से बनी खीर का भोग अर्पित करें।
पूजा के दौरान मां के मंत्रों का जाप करें।
इसके बाद पूजा में मां को लाल और पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें ।
इसके बाद मां को कुमकुम और अक्षत अर्पित करें।
फिर मां चंद्रघंटा को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए पूजा में पीले रंग के फूलों और वस्त्रों का प्रयोग करें।
साथ ही दुर्गा सप्तशती और अंत में मां चंद्रघंटा की आरती का पाठ भी करें
इन सभी विधियों को विधिपूर्वक करने से मां चंद्रघंटा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं।
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उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा कबीरधाम जिला के ग्राम मदनपुर में आयोजित भागवत गीता महापुराण में हुए शामिल

रायपुर। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा अपने कबीरधाम जिला के प्रवास के दौरान ग्राम मदनपुर में आयोजित भागवत गीता महापुराण में शामिल हुए। उन्होंने विधिवत पूजा-अर्चना कर प्रदेश की सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना की। धार्मिक आयोजन में भाग लेते हुए उन्होंने श्रद्धालुओं के साथ भक्ति और आध्यात्मिकता का अनुभव किया। उपमुख्यमंत्री ने जमीन पर बैठकर श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया और आयोजन समिति के सदस्यों से भेंट कर उनका कुशलक्षेम जाना।
इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री श्री शर्मा ने कहा कि श्रीमद्भागवत गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा देने वाला पवित्र मार्गदर्शक है। यह धर्म, कर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। उन्होंने इस आयोजन के सफल संचालन के लिए समिति और ग्रामवासियों को बधाई देते हुए इसे समाज में संस्कारों और सद्भाव को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया।
कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। ग्रामीणों ने उपमुख्यमंत्री श्री शर्मा का आत्मीय स्वागत किया और उनसे अपने क्षेत्र की विभिन्न आवश्यकताओं को लेकर संवाद किया। उनके आगमन से ग्राम में उत्साह और भक्ति का विशेष माहौल बना रहा।
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